अब स्पेस में रहें लूना गाया में

ऑस्ट्रेलियन वैज्ञानिकों ने एक नए स्पेस हैबिटेट का डिजायन तैयार किया है, जो एस्ट्रोनॉट्स को चांद या मंगल पर रहने के लिए 90-95 फीसदी तक आत्मनिर्भर बना देगा। इस तरह के सिस्टम से चांद पर या स्पेस में बनने वाली कॉलोनीज को सप्लाई देने वाली शटल के ट्रिप्स कम हो जाएंगी और अरबों डॉलर्स की बचत होगी। इस तकनीकी के जरिए जमीन पर भी ज्यादा सस्टेनेबेल खेती और रिसाइक्लिंग की प्रॉसेस में इजाफा होगा।

लूना गाया
हवा और पानी को रिसाइकल करने के लिए कुछ सिस्टम्स पहले ही तैयार किए जा चुके हैं और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में उनका इस्तेमाल किया भी जा रहा है। दक्षिण ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ एडीलेड में एयरोस्पेस इंजीनियर जेम्स चार्ट्रेस कहते हैं कि प्रस्तावित लूनर हैबिटेट हमारी मौजूदा भौतिक, रासायनिक और जीववैज्ञानिक तरीकों के आधार पर एक मिनी बायोस्फियर की तस्वीर पेश करेगा। सिडनी में हाल ही में उन्होंने ऑस्ट्रेलियन स्पेस साइंस कॉन्फ्रेंस के दौरान अपने इस डिजायन को पेश किया।

फेल हो चुका है एक प्रोजेक्ट
यह प्रोजेक्ट एरिज़ोना यूएस में फेल हो चुके बायोस्फियर 2 जैसा ही है, जिसे 1980 के दशक में तैयार किया गया था। 12 हजार वर्ग मीटर में बने इस बायोस्फियर में एक बंद इकोलॉजिकल सिस्टम के अंदर कोरल रीफ्स के साथ एक छोटे से समुंदर, घास के मैदान, मैन्ग्रोव, रेन फॉरेस्ट और कृषि जमीन के साथ दो साल तक 8 लोग रहे थे। लेकिन इसमें भोजन और ऑक्सीजन की कमी की वजह से यह प्रयोग फेल हो गया था। चाट्र्रेस ने कुछ छोटे, अंतरिक्ष उपयोगी अपने डिजायन को नाम दिया है लूना गाया।

30 स्पेस साइंटिस्ट्स की एक अंतर्राष्ट्रीय टीम के द्वारा तैयार लूना गाया एक क्लोज्ड लूप पर्यावरण होगा। इसका मतलब यह कि इस सिस्टम में बगैर बाहर से किसी चीज की जरूरत के तकरीबन हर चीज रिसाइकिल होगी। मौजूदा डिजायन 12 एस्ट्रोनॉट्स के 3 साल तक अंतरिक्ष में रहने के लिए तैयार किया गया है।

फिलहाल अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन में होने वाली रिसाइक्लिंग रासायनिक प्रक्रियाओं पर आधारित है। चार्ट्रेस का कहना है कि पूरी तरह आत्मनिर्भर रिसाइक्लिंग सिस्टम को तैयार करने के लिए बायोलॉजिकल रिसाइक्लिंग सिस्टम तैयार करना होगा और इसके ठीक से काम करने के लिए माइक्रो ऑर्गेनिज्म का होना जरूरी है।

अंतरिक्ष में फसलें
चाट्रेर्र्स की टीम ने एक बंद पारिस्थिकी तंत्र में जीवन के लिए जरूरी सभी चीजों का ख्याल रखा है। लूना गाया में जर्मन एयरोस्पेस सेंटर द्वारा डिजायन क्लोज्ड इक्वीलिब्रेटेड बायोलॉजिकल एक्वेटिक सिस्टम (सीईबीएएस) और यूरोपियन स्पेस एजेंसी के माइक्रो इकोलॉजिकल लाइफ सपोर्ट सिस्टम ऑल्टरनेटिव (मेलिसा) का इस्तेमाल किया गया है। मेलिसा में पानी के शुद्धिकरण, कार्बन डाई ऑक्साइड की रिसाइक्लिंग और कूड़े में से खाद्य पदार्थ निकालने के लिए माइक्रोब्स का इस्तेमाल किया जाता है। फोटो सिंथीसिस के जरिए कार्बन डाई ऑक्साइड को ऑक्सीजन में तब्दील करने वाली शैवाल इस प्रस्तावित डिजायन का मूल आधार है।

एस्ट्रोनॉट्स के लिए भोजन कुछ सामान्य फसलों और पैक्ड सप्लाई के जरिए आएगा। इन फसलों में मूंगफली, लैटुस, गेहूं, टमाटर और गाजर शामिल होंगी। इसके अलावा स्पिरुलिना और क्लोरेला शैवाल से कुछ विटामिन्स और मिनरल्स की कमी पूरी की जाएगी। भोजन मूलत: शाकाहारी होगा। हां, प्रोटीन के लिए तेजी से बढ़ने वाली मछलियों टिलापिया का इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसके अलावा सामान्य खाने से ब्रेक देने के लिए उन्हें कुछ चॉकलेट्स, फ्रूट सलाद और मसाले भी मिल जाया करेंगे।

चार्ट्रेस कहते हैं कि कोई भी लूनर बेस सौ फीसदी आत्मनिर्भर नहीं हो सकता क्योंकि कोई भी वातावरण किसी भी लीकेज से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है और वह मानव को जीवित रहने के लिए जरूरी सभी चीजें मुहैया नहीं करा सकता।

डिजायन लागू करने में दिक्कतें
पौधों से सिस्टम में आने वाले पैथोजन्स और फसलों से होने वाले पॉलीनेशन से कुछ दिक्कतें पैदा होंगी। इसके अलावा एक एस्ट्रोनॉट को भोजन देने के लिए 20 वर्ग मीटर एरिया में पौधों की जरूरत होगी।

मौजूदा प्रस्तावित सिस्टम को तुरत-फुरत शुरू नहीं किया जा सकता। चाट्र्रेस का कहना है कि अभी इस सैटअप के लिए जरूरी पैसे के लिए 20-30 साल लग सकते हैं और वह भी तब जब स्पेसक्राफ्ट में पौधे उगाने की जरूरत को समझा जाए। हालांकि नासा में स्पेस बायोसाइंसेज डिवीजन में बायो इंजीनियर मार्क क्लिस का कहना है कि उन्हें यह प्रोजेक्ट रोचक लग रहा है। क्लिस का कहना है कि भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधानों के लिए यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और साथ ही यह पृथ्वी पर भी जरूरी है।

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