Career in Software Development and BPO

इसी वर्ष माक्रोसॉफ्ट ने भारत में रिसर्च लैब स्थापित किया। भारतीय सूचना तकनीकी उद्योग के लिए यह एक नई बात थी। अब तक हमारा आईटी बाजार साफ्टवेयर डेवलपमेंट तथा बीपीओ जैसे सेवा क्षेत्रों तक सीमित था। माक्रोसॉफ्ट के इस नए उपक्रम का नाम है, माक्रोसॉफ्ट रिसर्च लैब इंडिया प्राइवेट लिमिटेड। पी आनंदन इस महत्वाकांक्षी संस्थान के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं, जो भारत में आईटी रिसर्च की अपार संभावनाएं देखते हैं। पी आनंदन आईआईटी, मद्रास से बीटेक और एमटेक हैं। यूनिवर्सिटी आफ मासेचुसेट से कंप्यूटर साइंस में पीएचडी करने के साथ उन्होंने लंबे समय तक अध्यापन व शोध कार्य किया है। माइक्रोसाफ्ट में आने से पूर्व वह याले यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस के प्रोफेसर थे। गत सप्ताह पी आनंदन वेब टेक्नोलॉजी के एक इंटरनेशनल कॉनफ्रेंस में भाग लेने दिल्ली आए हुए थे। इस मौके पर कंप्यूटर साइंस के क्षेत्र में रिसर्च की संभावनाआों पर उनसे विस्तृत बातचीत की गई। उन्होंने इस क्षेत्र में कैरियर की महत्वपूर्ण जानकारी दी।

भारतीय आईटी उद्योग किन नए क्षेत्रों में काम कर रहा है?
भारतीय आईटी उद्योग पहले सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट तथा सर्विस सेक्टर में काम कर रहा था, लेकिन आज रिसर्च और डेवलपमेंट के क्षेत्र में काफी काम हो रहा है। कंप्यूटर तथा सूचना तकनीक का विकास लगातार चलता रहता था। पहले यह काम विदेशों में होता था और भारत में उन तकनीकों का आयात कर हम उनका इस्तेमाल करते थे। लेकिन अब महसूस होने लगा है कि भारत में आईटी रिसर्च की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यहां ऐसे एक्सपर्ट बड़ी संख्या में मौजूद हैं जिनका इस्तेमाल शोध के लिए हो सकता है। माक्रोसॉफ्ट जैसी मल्टीनेशनल कंपनियां अपने रिसर्च सेंटर भारत में खोल रहीं है।

सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट तथा कंप्यूटर रिसर्च के क्षेत्र में काम करने वालों में क्या अंतर होता है?
शैक्षिक योग्यता और जानकारी के हिसाब से देखें तो कोई विशेष अंतर नहीं होता। रिसर्च और डेवलपमेंट के क्षेत्र में भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर ही काम करते हैं, अंतर होता है एप्रोच का। सॉफ्टवेयर या सेवा क्षेत्र में आपको यूजर की किसी समस्या को दूर करना होता है, इसमें आपके लक्ष्य आपका उपभोक्ता निर्धारित करता है। इसके विपरीत रिसर्च में टास्क रिसर्चर खुद निर्धारित करते हैं।
उन्हें ऐसे उपाय विकसित करने होते हैं जिनका उपयोग नई तकनीकों के विकास में हो सके। यह धैर्य का काम है और इसमें सालों साल समय लगता है। जैसे आज बाजार में ऐसे कई मोबाइल फोन उपलब्ध हैं जिनमें कंप्यूटर की सी सारी खूबियां मौजूद हैं। यह काम रिसर्च से ही संभव हो सका है।

रिसर्च के लिए किस प्रकार की क्षमताएं जरूरी हैं?
समान्यत: बीई या बीटेक के बाद सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में काफी अच्छा काम मिल जाता है, लेकिन रिसर्च के लिए जरूरी है कि आप कंप्यूटर साइंस में एमएससी करें। बेसिक रिचर्स में काम करने के लिए पीएचडी होना भी जरूरी है। पीएचडी के दौरान आप सीखते हैं कि समस्या पर किस प्रकार से विचार किया जाए। आप समस्या का इलाज ढूंढने की बजाए उसके पूर्ण निदान का विचार करने लगते हैं। तभी आपका दिमाग रिसर्च के लिए तैयार होता है। इसके लिए धैर्य रखना जरूरी है। भारत में आज यह एक बड़ी समस्या है। यहां पूरे वर्ष में तीस से चालीस कंप्यूटर साइंस पीएचडी निकलते हैं, जबकि दुनिया के कई विश्वविद्यालय, जैसे यूनिवर्सिटी आफ कैलिर्फोनिया, बर्कले अकेले प्रति वर्ष पचास से ज्यादा पीएचडी देती हैं। देखा जाए तो रिसर्च के क्षेत्र में तो आज लोगों की कमी है।

भारत में किन विषयों पर रिसर्च हो रही है?
वेब टेक्नोलॉजी, मल्टी लिंगुअल एप्रोच (कंप्यूटर द्वारा कई भाषाएं समझने की क्षमता), वायस इंटरफेस (कंप्यूटर को मानवीय आवाज द्वारा संचालित करना), जैसी तमाम तकनीकों पर आज भारत में काम हो रहा है। सरकारी तथा निजी दोनों सेक्टर रिसर्च में रुचि ले रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि हमारे रिसर्च का एक बड़ा बाजार है। चीन, अमेरिका तथा यूरोप के कई देश हमारे मार्केट हा े सकते है।

रिसर्च में क्या सुविधाएं हैं?
कंप्यूटर साइंस में पीएचडी करने वाले लगभग सभी लोगों को फेलोशिप मिल जाती है। पीएचडी के दौरान छात्र कंपनियों के कोलैबरेशन प्रोजेक्ट पर भी काम करते हैं। जहां तक कैरियर का सवाल है कंप्यूटर रिसर्च बेहतर फील्ड्स में से एक है। देश या विदेश, जहां भी काम करें, इस क्षेत्र में रिसर्च करने वालों को अच्छा वेतन और सुविधाएं मिलती हैं।

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